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गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

तुम्हारे लिए

मेरे प्यार!
मेरे मन ने सदैव चाहा
तुम्हारे घाव भरना
अब तुम कहोगे '
घाव भरना तो बोरोलीन भी जानती है'
लेकिन उसका स्पर्श नहीं है
मेरे अधरों की तरह कोमल
मैंने सदैव चाहा
अपनी ऊष्मा से तुम्हे तप्त कर ऊर्जा देना
अब तुम कहोगे
ये तो हीटर भी कर सकता है
पर नहीं है उसकी ऊष्मा में, मेरे प्यार की हिद्दत
मैंने सदैव चाहा तुम्हारे प्यार को अपने
तन-मन में संजो कर, एक संसार रच डालना
अब तुम कहोगे
ये काम तो करता  है सूरज भी
धरती के गर्भ से पानी लेकर
मैंने सदैव चाहा
उस संसार के लिए खाना-पानी जुटाना
अब तुम कहोगे
ये काम तो करती हैं हरी पत्तियाँ भी
सारे संसार के लिए, ज़रा सा क्लोरोफिल भून के
मेरी जान!!!
समझो तो सही सृष्टी औरत ही तो है
जो जीती है अपने सृजन की खातिर
और इतनी सुखी औरत जिससे कोई नहीं कहता
'ये काम तो तुम से अच्छा वोरोलीन, सूरज या पत्तियाँ करती हैं!!'
                                                                    -खुशी

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

जब मधुश्रुत की
पागल बयार छाएगी
सूनी रजनी
दुल्हिन सी शर्माएगी
तब सुबह
सेज के सुमनों को छू लेना
उनमे तुमको 
मेरी सुगंध आएगी 
-अज्ञात 

सोमवार, 1 नवंबर 2010



खयालो-ख्वाब हुआ, बर्गोबार का मौसम
बिछुड़ गया तेरी सूरत बहार का मौसम
कई रुतो से मेरे नीम वा दरीचों पर
ठहर गया है इंतज़ार का मौसम 
हवा चली तो नई बारिशें भी  साथ आई
ज़मी के चेहरे पे आया निखार का मौसम
वो रोज़ आके मुझे अपना प्यार पहनाए
मेरा गुरूर है बेले के हार का मौसम
रफ़ाक़तों के नए ख्वाब खुशनुमा हैं मगर
गुज़र चुका है तेरे ऐतबार का मौसम 
तेरे तरीका ऐ मोहब्बत पे बारहा सोंचा
ये जब्र था कि तेरे अख्तियार का मौसम 

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

खुशी

खुशी मासूम सी, बच्चों की कॉपी में इबारत सी
हिरन की पीठ पर बैठे परिंदे की शरारत सी

                                        


गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

वह गुराँस का फूल

प्रिये!!
निस्संदेह
 तुम सब भूल गए हो
दुष्यंत की तरह
प्रेम का एक क्षण भी
तुम्हे याद नहीं
पर क्या भूल गए
वह गुराँस का फूल
जो तुमने लगाया था
अंतिम बार
मेरे जूडे में
              

बुधवार, 22 सितंबर 2010

हजरत अमीर खुसरो, और कबीर को अर्पित , जिसकी आज समाज को बहुत ज़रूरत है






मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा
एक खुदा का वास

जैसा जिसने ढून्ढ लिया,
उसका वैसा "ख़ास"

रब तो सबका एक है
दिल है उसका धाम

प्यार मोहब्बत बांटना
है इंसा का काम

मन से उसको ढूँढो तो
 माटी में मिल जाए 

साहिब मेरा भोला सा
बच्चो में मुस्काए 



गुरुवार, 9 सितंबर 2010

सब से मिले वो शाना-ब- शाना, हमसे मिलाए खाली हाथ
ईद के दिन भी, सच पूछो तो ईद मनाई लोगों ने

 

ईद आई तुम न आए, क्या मज़ा फिर ईद का
ईद ही तो नाम है एक दूसरे के दीद का
सुना है ईद का दिन आ गया है
तुम्हारे दीद का दिन आ गया है 

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

ईद


ईद आई है
 तो सब कुछ नया है
रंग भी हैं
फूल भी ओंर खुशबू भी
ज़र्रे ज़र्रे पे नशा है
नई रौनक है
हर एक शय पे आखिर ईद का हक है
चाँद  शादा है,ज़मी खुश है
चमन है रौशन
ईद से खुश हैं सब
ये बस मुझको ही तंग करती है
तुम ही सोचो मेरी जान!!
खंडहरों में भी कही ईद मना करती है



बुधवार, 1 सितंबर 2010


तू है राधा अपने कृष्ण की
तिरा कोई भी होता नाम
मुरली तेरे भीतर बाजती
किस बन भी करती बिसराम
या कोई सिंहासन बिराजती
तुझे खोज ही लेते श्याम
जिस संग भी फेरे डालती
संजोग में थे घनश्याम
क्या मोल तू मन का मांगती
बिकना था तुझे बेदाम
बंसी की मधुर तानो से
 बसना था ये सूना धाम
तिरा रंग भी कौन सा अपना
मोहन का भी एक ही काम
गिरधर आके भी गए और
मन माला है वही नाम
जोगन का पता भी क्या हो
कब सुबह हुई कब शाम
                                     -परवीन शाकिर  

ये हवाएं क्यों उड़ा ले गयी आँचल मेरा
यूँ सताने की आदत तो मेरे घनश्याम की थी
                                        -परवीन शाकिर 

सोमवार, 23 अगस्त 2010

तुम आज


(1)
आज पूरे हो
कोई दुख नहीं
कोई उलझन नहीं
बादलों पर चलते हो
हवा पर हुकुम चलाते हो
कभी याद करते हो
उस अधूरेपन को
जो सिर्फ पूरा होता था
हमारे मिलने पर
जँहा से मिली थी
पूरे होने की प्रेरणा
जँहा से उपजी थी चाह
फैली थी उजास
जिए थे तुम
सपनो के आस पास
आज
आज पूरे हो
तो याद नहीं आता
वह अधूरापन?
सर नहीं उठाती
कोई तड़पन?
दिल पर हाथ रख कर कहो
क्या तुम पूरे हो?
या मेरी ही तरह
आज तक 
अधूरे हो?
(2)
मै खिलौना थी
तो तोड़ने की अपेक्षा
छोड़ गए होते
मै फूल थी तो मसलने कि बजाय
सुखा कर डायरी में रख लिया होता
मै अगर औरत सी लगती थी
तो मन की निजता मै एक कोना तो दिया होता
अफ़सोस !!!!
तुम्हारे लिए तो मै सिर्फ एक ज़ात थी
क्षुद्र! अछूत!!  विजातीय!!! 
कितने विशेषण थे
जो मैंने तब सुने थे
जब कोई मर्द औरत को छोड़ते हुए जाता है
सही ही कहा था तुमने
ज़ात तो पुरुष की होती है
औरत तो हमेशा
ब्रहम्मा के पैरों से ही जन्मी है
(3)
मन तो अकेला है
तन से भी ज़्यादा
मन तो घायल है 
तन से भी ज़्यादा
मन तो दुखता है
तन से भी पहले
तो मै !!
मन का बंधन थी 
तभी ही,  
आज जब तन की हर ज़रूरत पूरी है
शायद मै तुम्हे मन बन कर याद आ रही हूँ
शिशिर कि रात्री मै
चौदस के चंद्रमा सी तड़पा रही हूँ!!!! 

बुधवार, 11 अगस्त 2010

ईद का चाँद

चाँद देखा तो याद आई सूरत तेरी 
हाथ उट्ठे हैं मगर हर्फे दुआ याद नहीं

बुधवार, 4 अगस्त 2010



अब्रे-बहार ने
फूल का माथा,
अपने बनफ्शी हाथो में लेकर
ऐसा चूमा
फूल के सारे दुःख
खुशबू बन कर बह निकले हैं
                                        


शुक्रवार, 30 जुलाई 2010


हिज्र की शब् का किसी तौर से कटना मुश्किल
चाँद पूरा है तो फिर  दर्द का     घटना मुश्किल   

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

शरारत


आओ इस मौसम में आकर कोईं शरारत कर बैठो
अल्लाह अल्लाह खामोशी से हूँ कितनी हैरान सी मै
                    खुशी              

रविवार, 25 जुलाई 2010

बारिश

पैरों की मेहंदी मैंने
किस मुश्किल से छुड़ाई थी
और फिर बैरन खुशबू से कैसी कैसी
बिनती की थी
प्यारी धीरे बोल
भरा घर जाग उट्ठेगा
लेकिन जब उसके आने की घड़ी हुई
सुबह से ऐसी झडी लगी
उम्र में पहली बार मुझे
बारिश अच्छी नहीं लगी.

माँ


 "वो एक लम्हा कि मेरे बच्चे ने माँ कहा मुझको
मै एक शाख से कितना घना दरख़्त हुई!!! "
                                                      -परवीन शाकिर

शनिवार, 24 जुलाई 2010

काश! वह रोज़े हश्र भी आए....


 तू मेरे हमराह खडा हो
सारी दुनिया पत्थर लेकर 
जब मुझको संगसार करे
तू अपनी बांहों में छुपाकर
तब भी मुझ से प्यार करे...!!!!! 

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010


याद कुछ इस तरह जगाती है
टुकड़ों टुकड़ों में नींद आती है
मौत की दुश्मनी है पल भर की
ज़िंदगी उम्र भर रुलाती है
                                  डॉ. कुअर बेचैन

 "रात तो निकल ही आई क़त्ल-गाहों से,
साथ जो ख़्वाब थे, सारे शहीद हो गए....."
                                 -अज्ञात
    

रविवार, 18 जुलाई 2010

कड़ी धूप में छाओं जैसी बातें करतें हैं
आंसू भी तो माओं जैसी बातें करतें हैं

रास्ता देखने वाली आँखों के अन्होने ख़्वाब
प्यास में भी दरयाओं जैसी बातें करते हैं

खुद को बिखरता देखते हैं कुछ कर नहीं पातें हैं
फिर भी लोग खुदाओं जैसी बातें करतें हैं

एक ज़रा सी जोत के बल पर अंधियारों से बैर
पागल दिए हवाओं जैसी बातें करें हैं 






मुझे प्यार करते हो करते रहो तुम......

मुझे प्यार करते हो करते रहो तुम
मगर दिल लगाने की  कोशिश न करना
कि खुशबू हूँ मै मुझको महसूस करना
मगर मुझको पाने की कोशिश न करना

जो हंस लूं तो क्या है, जो रो लूँ तो क्या है
ये हंसना भी फानी, वो रोना भी फानी
कि कुछ भी नहीं सालता मेरे दिल को
ये पत्थर गलाने की कोशिश न करना

सुना है कि प्यार मरता नहीं है
जो मरता नहीं है तो जाता कहाँ है
यहाँ है, वहा है तो सचमुच कहाँ है
मुझे ये बताने की कोशिश न करना
                      -दीप्ति मिश्र 

बिछड़ा है एक बार तो फिर मिलते नहीं देखा
इस ज़ख्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा

एक बार जिसे चाट गई धूप की ख्वाहिश
फिर शाख पे उस फूल को खिलते नहीं देखा


कांटो में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन
तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा

किस तरह मेरी रूह हरी कर गया आखिर
वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा
-------------(परवीन शाकिर)





शनिवार, 17 जुलाई 2010

आओ कि कोई ख्वाब बुने कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ इस तरह कि जान-ओ-दिल
ताउम्र फिर कभी न कोई ख़्वाब बुन सके.......  

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

भूल गए वो दिन
भूल गए वो रातें ओंर बातें
भूल गए वो ख्वाब
भूल गए वो रंग-तरंग
पर क्या
वो बच्चा भी भूल गए
जो मेरे ओंर तुम्हारे ख्वाबों में
साथ साथ हलचल मचाता था

बोलो ?

लबों ने लबों से
जब कुछ कहा था
नज़र ने नज़र से
जिद में पढ़ा था
वो अनकही
क्या तुम्हारे ज़हन में
अब भी है
और है
तो क्या तुम भी
मेरी तरह छुप छुप के
पूरी बरसात
रोते रहते हो
बोलो ?

चाँद चमकता है
तुम तक ले जाता है
रात बहकती है
तुम याद आते हो
बूंदे बरसती हैं
तुम्हारा चेहरा बन जाता है
रातरानी खिल खिल कर
जिस्म और रूह को
तुम तक ले जाती है
रोकती हूँ खुद को तुम्हारी यादों से
पर तुम!!!
तुम्हारी उस बैचेनी से ही
कहाँ रह पाते हो आपे में
अपने आप ही कि तरह
बार बार आते हो ज़हन में
चोरी से नहीं
जिद से
क्यों आते हो
क्या है अब यहाँ
वो जिस्म जो सिर्फ
तुम्हारी अमानत बना
रख छोड़ा था
भरी बरसात में
सूखा पड़ा है
वो जान जो
तुम्हारे नाम थी
अब कुछ भी याद नहीं करती
सब मान गए हैं
कि तुम बेवफा हो
पर इन आँखों का क्या करूँ
जो अब भी  लगती नहीं
जो अब भी मानती नहीं
पत्थर हो गई हैं
पर गाहे ब गाहे
तुम्हारे स्पर्श को याद कर
गीली हो उठती हैं
अब दुआ दो
या तो ये खुली रह जाएं
या बंद हो जाएं
दो न जान..................!

छन के आती है शिगाफों से हिना की खुशबू
किसने मेहंदी  भरे हाथों से ये दस्तक दी है
हथेलिओं कि दुआ फूल लेके आई हो
कभी तो रंग मेरे हाथ का हिनाई हो

कोई तो हो जो मेरे मन को रौशनी भेजे
किसी का प्यार हवा मेरे नाम लाइ हो

गुलाबी पाँव मेरे चंपाई बनाने को
किसी ने सहन में महंदी कि बाढ़ उगाई हो

वो  सोते जागते रहने के मौसमो का फूसों
के नींद में रहू और नींद भी न  आई हो ..........
                                - परवीन शाकिर                     


बुधवार, 7 जुलाई 2010

तुम जाग रहे हो मुझे अच्छा नहीं लगता चुपके से मेरी नींद, चुरा क्यों नहीं लेते ?

कैद में गुजरेगी जो, वो उम्र बड़े काम कि थी
पर मै क्या करती कि ज़ंजीर तेरे नाम कि थी

जिसके माथे पे मेरे बख्त का तारा चमका
चाँद के डूबने कि बात उसी शाम की  थी

वो कहानी कि सभी सुइयां निकली भी न थी
फिक्र हर शख्स को शहजादी  के अंजाम कि थी

बोझ उठाये हुए फिरती है हमारा अब तक
ऐ ज़मी माँ ! तेरी ये उम्र तो आराम की थी
                                      ( परवीन शाकिर)

शनिवार, 3 जुलाई 2010

तुम मुझको गुडिया कहते हो
सच कहते हो
खेलने वाले सब हाथों को 
गुडिया ही तो लगती हूँ मै
जो पहना दो मुझपे सजेगा
मेरा कोई रंग नई
जिस बच्चे के हाथ थमा दो
मेरी किसी से जंग नहीं
कूक भरो बीनाई लेलो
जब चाहे बीने लेलो
मांग भरो सिन्दूर सजाओ
प्यार करो
आँखों में बसो
और जब दिल भर जाए तो
दिल से उठा के टाक पे रख दो
तुम मुझको गुडिया कहते हो
सच ही तो कहते हो
                 प्रस्तुति : खुशी
परवीन शाकिर 

रविवार, 27 जून 2010



इससे पहले कि तुम बदल जाओ
ऐ दोस्त मेरी ग़ज़लों में ढल जाओ

मंगलवार, 15 जून 2010

कल सुलगती दोपहर में, उसकी यादों के गुलाब
इस तरह महके कि सारा घर गुलिस्ता हो गया
                                         निदा फाज़ली 

सोमवार, 14 जून 2010

तन्हाई

इसके बाद बहुत तन्हाँ है, जैसे जंगल का रास्ता
जो भी तुमसे प्यार से बोले साथ उसी के हो लेना
                                                    -डा.- बशीर बद्र 

सर्दी कि वह शाम

तुम कहते थे 
किस मिट्टी की बनी हो
बहकती क्यों नहीं
मेरे साथ रह कर भी
हमदम!
बादल जब खामोशी से
पर्बतों को चूमने लगे थे
मैंने बेखुदी मै
तुम्हारा कंधा थाम लिया था
तुम्हे याद है
मेरे बहकने की वह शाम
सर्दी की वह शाम  
 

क्या भुलाऊँ

तुम कहते हो वह अतीत था
उसे भुला दो
बोलो भूल जाऊं वह मीठा लम्हा
जब कि तुमने मुझे पहली बार छुआ था
भूल जाऊं वह मासूम सा वक्त कि जब तुमने मुझे
ठिठोली कर जतलाया था कि 
तुम मुझे चाहते हो
भूल जाऊं वह क्षण 
जब कि तुम पहली बार जले थे 
किसी और ने मेरी तारीफ़ की थी तो
भूल जाऊं वह बेखुद लम्हे
जब कि तुम बेखुद बेसुध से
मुझे जकड जडवत रह गए थे 
पूरे साड़े आठ मिनट 
मेने रोते हुए कहा था 
तुम्हारे बाद नहीं छूँगी  किसीको
क्या तुम्हे कुछ भी याद नहीं
कुछ भी नहीं
और जब नहीं ही याद 
तो आकर लेजाओ वो नन्ही गुडिया 
जो तुमने मुझे मेले से लेकर दी थी
चाबी का वह छल्ला
जिसमे मेरे नाम का पहला अक्षर
गूंथ लाए थे तुम 
और जिसे लेकर सिसक पडी थी मै
आकर फिर से छीन लो
वही शंख जिसे तुम्हारे कमरे से जाते वक्त
ऐसे सहेज लाई थी 
जैसे मंदिर से लौटते वक्त वेदी का कोईं फूल
धो दो उस रूमाल को
जिससे तुमने एक बार मुह पोंछा था
और मैने उसे
उसके बाद कभी नहीं धोया
अगर तुम सचमच  भूल चुके हो तो प्रियतम 
प्रार्थना करो कि अब जीवन मुझे मुक्ति देदे 
क्योंकि देह के साथ ही
तुम्हारा प्रेम मिटेगा
प्रेम में ईश्वर है 
यह एहसास मिटेगा
                     -ख़ुशी

सोमवार, 7 जून 2010

मोहब्ब्त

मोहब्ब्त
मोहब्ब्त एक खुशबू है, हमेशा साथ चलती है
कोई इंसान तन्हाई में भी तनहा नहीं रहता

गुरुवार, 3 जून 2010

मुहब्बत हम से करनी है


मुहब्बत हम से करनी है तो फिर वादा नहीं करना
ये कि हमने देखा हैये वादे टूट जाते हैं
मुहब्बत हम से करनी है
तो फिर जिद भी नहीं करना
इसी जिद से ये देखा है कि
साथी छूट जातें हैं


मुहब्बत हम से करनी है
तो फिर तोहफे नहीं देना
कि हमने देखा है ये तोहफे
बड़ा मजबूर करतें हैं


मुहब्बत हम से करनी है
तो फिर शिकवा नहीं करना
कि हमने देखा है
ये शिकवे दिलों को दूर करते हैं

मुहब्बत के हंसी लम्हों में 
दिल रंजूर करते हैं 

आजकल

बड़े ताबां बड़े रोशन सितारे टूट जाते हैं
सहर की राह तकना तासहर आसां नहीं  होता........ 
याद नहीं किस किसकी हल्की सी यादें ज़हन में घुस कर शोर करती हैं, लेकिन इतना याद होता है शेर किसी नामी गिरामी शाएर का है बिलकुल जैसे नीचे वाली नज़म:
"काश वो रोज़े हश्र भी आये" 
तू मेरे हमराह खड़ा हो
सारी दुनिया पत्थर लेकर 
जब मुझको संगसार करे 
तू अपनी बांहों में छुपा कर 
तब भी मुझसे प्यार करे 
इन नज्मों के ज़िंदा कलेक्शन से दिल धड़क तो जाता है पर इतना भी लगता है कि बड़ा कलेजा चाहिए इतना सच लिखने और सोंचने के लिए..... नहीं क्या.  

मंगलवार, 1 जून 2010

इब्ने इन्शां

प्रीत करना तो हम से निभाना सजन
हमने पहले ही दिन था कहा न सजन

अब जो होने के किस्से सभी हो चुके
तुम हमें खो चुके हम तुम्हे खो चुके

आगे दिल की न बातों में आना सजन
के ये दिल है सदा का दीवाना सजन

ये भी सच है न कुछ बात जी की नई
सूनी रातों में देखा किए चांदनी

पर ये सोदा है हमको पुराना सजन
और जीने का अपने बहाना सजन

एक मुद्दत हुई सब्र करते हुए
और कूए  वफ़ा से गुज़रते हुए

पूछकर इस गदा का ठिकाना सजन
अपने इंशा को भी देख आना सजन 
शाख-ए- बदन को ताज़ा फूल निशानी दे
कोई तो हो जो मेरी जड़ों को पानी दे

अपने सारे मंज़र मुझसे ले ले और
मालिक! मेरी आँखों को हैरानी दे

उसकी सरगोशी में भीगती जाए रात
 कतरा-कतरा तन को नई कहानी दे

उसके नाम पे खुले दरीचे के नीचे
कैसी प्यारी खुशबू रात की रानी दे

बात तो तब है मेरे हर्फ़  गूँज के साथ
कोई उस लहजे को बात पुरानी दे 
अक्ब में गहरा समंदर है, सामने जंगल
किस इन्तेहाँ पे मेरा महरबान छोड़ गया

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

ख़ुशी मासूम सी बच्चे की कॉपी में इबारत सी
हिरन की पीठ पर बैठे परिंदे की शरारत सी।

खुश हो जाने के लिए ही ब्लोगिंग करना है मुझे यार! ऐसा तो हम पेशे खिदमत हैं जनाब, अपने फड़कते ब्लॉग के साथ:

जीवन साथीसे.....

धूप में बारिश होते देख के

हैरत करने वाले!

शायद तूने मेरी हंसी को

छूकर

कभी नहीं देखा! -परवीन शाकिर

सपना

आँखों की शाखों से

ख़्वाबो के खोशे चुनतीं

तुम सपनो का सच हो

या सच का सपना- शीन काफ निजाम

तखलीक
एक बोसीदा सी

ज़न्गालूद तोप के

दहाने पैर

एक नन्ही-मुन्नी चिड़िया ने

घोंसला बनाया hai - mohammed alvee

bataaiye जनाब kaisaa lagaa nannhaa sa yah collection........................

aapkee khushi